शरीर के उपकरण को सीखिए | सम्पूर्ण स्वास्थ्य —भाग 15

शरीर के उपकरण को सीखिए: हमारा शरीर हमारा हर दिन कुछ न कुछ कहता है। कभी भूख के रूप में, कभी थकान के रूप में, कभी नींद के रूप में और कभी मोटापे या भारीपन के रूप में। समस्या यह है कि हम शरीर की आवाज सुनने से ज्यादा उसे चिप्स खाने की कोशिश करते हैं।
भूख लगी—चाय पी ली।
थकान हुई—कॉफ़ी पी ली।
नींद आई—मोबाइल बजाते रहे।
पेट भारी हो गया—फिर भी खाना खा लिया।
तनाव बढ़ा—फिर भी खुद को आराम नहीं दिया।
धीरे-धीरे शरीर के छोटे संकेत हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाते हैं और हम उन्हें सामान्य संकेत देते हैं।
शरीर के उपकरण को सीखिए
संपूर्ण स्वास्थ्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है अपने शरीर की देखभाल करना। शरीर में होने वाले हर बदलाव को बीमारी मान लेना सही नहीं है, लेकिन हर संकेत को संदेह करना भी समझदारी नहीं है।
शरीर हमें हमेशा शब्दों में नहीं बताता कि उसे क्या करना चाहिए। वह अपनी भाषा में संकेत देता है।
थकान का दावा है—आराम की जरूरत हो सकती है।
पैसा कहता है—पानी की जरूरत है।
भूख का वर्णन है—शरीर को ऊर्जा चाहिए।
नींद आना बताता है—शरीर और मन को विश्राम चाहिए।
भोजन के बाद भारीपन या मितव्ययता हमें यह सलाह का अवसर दे सकती है कि हमारे भोजन की आदतें कैसी हैं।
यही जागरूकता स्वास्थ्य की शुरुआत हो सकती है।
हम सच में अपने शरीर पर क्या रिपोर्ट करते हैं?
एक दिलचस्प बात है- हम अपने फोन की बैटरी 20 प्रतिशत बढ़ाते हैं और चार्जर भी लेते हैं, लेकिन शरीर की ऊर्जा कम होने पर आराम करने के बजाय अक्सर काम करते रहते हैं।
फोन गर्म हो जाए तो हम उसे कुछ देर से इस्तेमाल बंद कर देते हैं, लेकिन शरीर में थकान के लक्षण दे तो हम उसे बंद कर देते हैं।
फ़ोन की सेवा समय पर संरचनाएं हैं, लेकिन शरीर की साज़िशों को अक्सर "बुरा में देखना" कहकर टाल देते हैं।
शरीर की कोई मशीन नहीं है, लेकिन इस उदाहरण से एक बात आसानी से समझ में आ जाती है—जिस चीज की हमें जरूरत होती है, उसके यंत्र पर ध्यान देना जरूरी है।
भूख और स्वाद में अंतर समझें
कई बार हम भूख के कारण नहीं, बल्कि स्वाद, आदत या भावना के कारण सोचते हैं।
टीवी देखने पर कुछ खाने का मन हमेशा के लिए वास्तविक भूख नहीं हो सकता।
तनाव में बार-बार कुछ खाने की इच्छा होना भी केवल भूख का संकेत नहीं हो सकता।
इसलिए कभी-कभी खुद से पूछना उपयोगी होता है- "मुझे सच में भूख लगी है या सिर्फ खाने का मन हो रहा है?"“
यह छोटा-सा प्रश्न हमारे डॉक्टर के सुझाव के प्रति जागरूकता को बढ़ा सकता है।
थकान को हमेशा मत समझो
थकान को हम बार-बार अलस का नाम देते हैं। लेकिन शरीर को आराम की जरूरत भी हो सकती है।
लगातार काम, कम नींद, तनाव और विभिन्न प्रकार के बीच शरीर का थका हुआ स्वभाव हो सकता है।
हर बार थकान का मतलब बीमारी नहीं होता है, लेकिन लगातार या असामान्य थकान होना भी ज़रूरी नहीं है।
शरीर अगर बार-बार आराम की मांग कर रहा है, तो अपनी अनदेखी पर एक नजर जरूरी है।
पेट भी बहुत कुछ बताता है
आयुर्वेद में पाचन को स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण आधार माना गया है। इसलिए भोजन के बाद शरीर कैसा महसूस करता है, इस पर ध्यान देना उपयोगी हो सकता है।
भोजन के बाद क्या प्रभाव पड़ता है?
क्या होता है बार-बार भारीपन?
भोजन का समय क्या है?
क्या बिना भूख के खाना आम आदत बन गई है?
इन सवालों के जवाब में आप अपनी बारीकियों को समझकर मदद कर सकते हैं।
नींद को सिर्फ रात का मामला मत समझिए
नींद शरीर और मन के विश्राम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। देर रात तक जागना और सुबह जल्दी उठना अगर लगातार ध्यान न दिया जाए, तो शरीर की प्राकृतिक लय प्रभावित हो सकती है।
कभी-कभार देर से सोना अलग होता है, लेकिन अगर पर्याप्त आराम की बात नहीं है तो शरीर में लगातार थकान महसूस हो रही है या नींद की समस्या बनी हुई है, तो उस संकेत पर ध्यान देना चाहिए।
मन के संकेत भी सुनिये
हम शरीर के सामान की बात करते हैं, लेकिन मन भी संकेत देता है।
बिना किसी कारण के इत्मीनान की आवश्यकता।
किसी काम में मन न लगाना।
हर समय ख़राब महसूस होना।
लगातार तनाव में रहना।
आराम करने के बाद भी मन का शांत न होना।
इन आश्रमों को भी पुरातत्व एवं मानसिक विश्राम के संदर्भ में देखना आवश्यक है।
शरीर और मन अलग-अलग होते हैं। दोनों लगातार एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।
आयुर्वेद में संतुलन का महत्व
आयुर्वेद शरीर में वात, पित्त और कफ के संतुलन की अवधारणा के माध्यम से शरीर की पुनरावृत्ति को समझने का एक तरीका प्रस्तुत करता है। लेकिन इसका उद्देश्य केवल यह पहचानना है कि किसी व्यक्ति की प्रकृति वात, पित्त या कफ है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने शरीर में होने वाले बदलावों को देखें और अपनी बात को विपरीत, भोजन, आराम और वातावरण के साथ बेहतर मिश्रण बनाने की कोशिश करें।
हर व्यक्ति अलग है। इसलिए जो व्यक्ति एक व्यक्ति के लिए ठीक बैठता है, जरूरी नहीं कि वह दूसरे के लिए भी समान रूप से उपयुक्त हो।
शरीर की सीख भाषा एक अभ्यास है
आपके शरीर को कोई एक दिन का काम नहीं है।
कुछ दिन तक ध्यान दें।
आपको वास्तविक भूख कब लगती है?
किस भोजन के बाद शरीर पर प्रभाव पड़ता है?
ऊर्जा सबसे अधिक कब रहती है?
के बाद आपको हल्की नींद महसूस होती है?
आपको आराम की आवश्यकता कब महसूस होती है?
कौन सी आदत के बाद शरीर ख़राब महसूस होता है?
इन छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देने से शरीर के साथ बेहतर संवाद की शुरुआत हो सकती है।
लेकिन हर संकेत का खुद इलाज न करें
शरीर के सुझावों का अर्थ यह नहीं है कि हर समस्या का इलाज खुद ही शुरू कर दिया जाये।
यदि कोई लक्षण लगातार बना रहता है, बहुत अधिक बढ़ जाता है, बार-बार लौटता है या स्थिर के जीवन को प्रभावित करता है, तो उपयुक्त चिकित्सक से सलाह लेना आवश्यक है।
जागरूकता का अर्थ है संकेत को पहचानना—न कि बिना समझे उसका निष्कर्ष निकालना।
संपूर्ण स्वास्थ्य की शुरुआत
संपूर्ण स्वास्थ्य केवल यह नहीं पता कि हमें क्या खाना चाहिए या कौन-सी जानकारी अपनानी चाहिए।
यह संकेत की यात्रा भी है कि हमारा शरीर हमें क्या बता रहा है।
संभवत: अगली बार जब शरीर में थकान, भूख, प्यास, नींद या कमजोरी का कोई संकेत दे, तो उसे तुरंत एक पल रुककर पूछने के बजाय-
“मेरी बॉडी मेरी क्या कह रही है?”
कभी-कभी स्वास्थ्य की दिशा में पहले कदम पर कोई नई चीज शुरू नहीं होती, बल्कि आपके शरीर की पुरानी आवाज पर ध्यान देने की बात कही जाती है।
लेखक की टिप्पणी
शरीर के साथ हमारा जीवन भर रहता है, इसलिए उसके बर्तनों को किसी विशेष अवसर का काम नहीं, बल्कि रोजमर्रा की आदत बनानी चाहिए। शरीर की हर बीमारी से कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन उसकी लगातार अनदेखी से भी स्वास्थ्य का कोई फर्क नहीं पड़ता।
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